आगे ही नही पीछे भी

राजनीति में आस्था का प्रवेश

भारतीय चिंतन में श्रद्धा विज्ञान का विषय रहा जिज्ञासा इसका मूल है। जानना और जानते रहना सदा की प्रकृति है, तर्क इसका आधार है और सिद्धि इसकी परिणति। राम कथा में स्त्री का चरित्र श्रद्धा को पुष्ट करता है। सती का शिव के समस्त तर्कपूर्ण रीति से यह जिज्ञासा प्रकट करता है कि वे आदि जिस ब्रह्म सत्ता को व्यापक, अजन्मा और अमूर्त बताते हैं वह देवधारी तथा उसमें भी पत्नी के वियोग से वन-वन  भटकने वाला कैसे हो सकता है। सती (श्रद्धा) ने यह प्रश्न शिव (विश्वास) से पूछा, शिव ने पत्नी वियोग में भटक रहे राम की परीक्षा लेने का सुझाव दिया। सती ने सीता का रूप धारण किया क्योंकि यदि राम सर्वज्ञ होंगे तो मेरे असली रुप को जान जायेगे। सीता वेशधारी सती जब राम के समक्ष गयी तो राम ने सीधा प्रश्न किया कि शिव कहाँ है और आप अकेली वन में किस कारण घूम रही हैं ? सती को राम की सर्वज्ञता का ज्ञान हो गया और के भय के मारे काँपने लयी। शिव के पास लौटने पर सती ने अपने तर्क की कसौटी पर राम नहीं पाया और उस उनकी शक्ति का आभास देना है उन्होंने उचित नहीं माना। तर्क अपनी बुद्धि तथा चालाकी को सर्वोपरि मानता है अपने विश्वसनीय आभास को भी नकार सकता है। फिर भी तर्क सत्य तक पहुंचने का साधन श्रद्धापूर्वक बना रह सकता है। सती का अगला जन्म जब पार्वती के रूप में हुआ तो पुनः शिवजी उन्हें पति के रूप में मिले। सती दक्ष कन्या थी, दक्षत्व शिवत्व का तिरस्कार कर सकता है वह अविचल नहीं थी, सत्य की परख छद्म व्यवहार द्वारा करना चाहती थी, पार्वती के रूप में वह दृढ़ निश्चयी, श्रद्धा स्वरूप हैं और विवाहोपरांत शिव के समक्ष पुनः वही प्रश्न करती हैं कि व्यापक, अजन्मा कैसे देहधारी हो सकता है आदि। एक अच्छी बात यह रही कि प्रश्न विश्वास स्वरूप शिव से पूछा गया जिनके पास आत्मज्ञान और अनुभव है तथा ब्रह्म सत्ता का साक्षात्कार है केवल बुद्धिपरक शास्त्र विमर्श के आधार पर पार्वती के प्रश्न शाश्वत प्रश्न तो हो सकते हैं किंतु विश्वास पूर्वक उनका समाधान प्रतीक्षित रहा। श्रद्धा का यह स्वरूप इसलिए भी विज्ञान सम्मत है क्योंकि इसमें विश्वास के उत्तर हैं। श्रद्धावान ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं और विश्वास फलदाई होता है। श्रद्धाचिंतन को परिष्कृत कर देती और विश्वास उसे परिपुष्ट, ये दोनों धाराएं मानव जीवन को विभु सत्ता का साक्षात्कार करा सकती है। जानने वाला मान लेता है और मानने वाला जान भी लेता है। किंतु ये दोनों प्रविधियों में से यदि कोई भी प्रविधि न हो तो अपने अंतस में विराजमान सत्य का साक्षात्कार नहीं हो सकता। तुलसीदास ने स्पष्ट कहा कि श्रद्धा विश्वास के रूप में विराजमान पार्वती और शिव की वंदना करता हूं जिनके बिना अपने भीतर स्थित ईश्वर तत्व को नहीं देखा जा सकता पार्वती का मार्ग विज्ञान का और शिव का मार्ग विश्वास का है दोनों ज्ञान और भक्ति के स्वरूप है।


         आस्था ना तो श्रद्धा का और न तो विश्वास का विषय है, यह काल्पनिक अप्राप्य तथा मिथ्यात्व पर आधारित है। यह कोई प्रतीत भी नहीं जिसे तर्क द्वारा प्रमाणित किया जा सके और न तो यह ऐसा कोई अस्तित्व ही है जिस पर विश्वास किया जा सके। यह एक ऐसी कल्पना है जो ना तो सरकार हो सकती है और ना तो जागृत अवस्था में दृश्यमान हो सकती है। यह एक हेत्वाभास है जो अस्तित्व शून्य और प्रतीत रहित है। आस्था एक ऐसी छाया है जो सूर्य की ओर उन्मुख होने पर पीछा करती है और सूर्य के विमुख होने पर आगे आगे चलती है। ज्ञान के उदय काल में आस्था पीछे अज्ञान के विमुख होने पर आगे हो जाती है। पुर्ण अज्ञान (रात्रि) की अवस्था में यह लुप्त हो जाती है। स्पष्ट है कि आस्था अज्ञान जनित आभास है जो मन को मोह तो लेती है किंतु विवेक जागृत होने पर वह मिट जाती है और भूल का भी साक्षात्कार कर देती है। हम पाते है दुनिया में आस्था उत्पन्न करने वालो की कमी नही रही अर्थात काल्पनिकता के आधार पर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले कम नही रहे। यहाँ यह समझना भारी भूल है कि हम और भी ऐसे विचारो और भावनाओ में उलझे रहते है जिनका प्रत्यक्ष अस्तित्व नही होता , किन्तु आस्था का साक्षात्कार असम्भव है क्योंकि इसका जन्म दृश्य और विलोपन अपने विवेक के सापेक्ष है। विवेक न होने पर आस्था बनी रहती है वो विवेक होने पर स्वतः मिट जाती है।
दुनिया का इतिहास साक्षी है कि विश्वास और सत्ता एक दूसरे के साथ साथ हजारों वर्षों से चलते रहे हैं। विश्वास के केंद्र, सत्ता प्राप्ति के साधन बनाए जाते रहे हैं और सत्ता का समर्थन प्राप्त करके अपने अस्तित्व विस्तार तथा बाजार उत्पन्न करते रहते हैं। भोगों का विरोध अथवा अभोग से सुख प्राप्ति या विश्वास निर्दिष्ट पथ पर चलने से जीवन का अंतिम उद्देश्य निर्धारित करने वाले भोग के नए साधन बाजार, व्यापार और व्यवहार उत्पन्न कर लेते हैं ताकि वे समाज से अपने को भिन्न रूप में स्थापित कर सके, सम्मान प्राप्त कर सके, और प्रतिस्थापित साधन जुटा सकें। विश्वास के ऐसे केन्द्र अपने अनुकूल सत्ता की चाह करते रहते हैं और अवसर का लाभ उठाकर सत्ता लोलुप भी इनका सहयोग प्राप्त करते रहते हैं। सत्ता लोभी यह जानते हैं कि आम जनता आस्थावान होती है उसमें विवेक का स्तर सामान्य से भी कम होता है इसलिए विश्वास जो व्यक्ति, केंद्र और निर्दिष्ट साधनों से सिमट गया है उसमें न जाकर एक उत्पन्न आस्था से संतुष्ट हो जाते हैं और श्रद्धा और विश्वास का दायित्व निभाने के वजाए प्राथमिक और व्यय भार वहन कर के निश्चिंत हो जाते है। सत्ता लोलुप आम जन मन पर उत्पन्न आस्था का सीधे अथवा आस्था केंद्र संचालकों के माध्यम से शोषण करने में सफल हो जाते हैं। सत्ता लोलुप को समर्थ देने उसके संबर्द्धन और उसे सम्मानित करने का आश्वासन देकर सत्तासीन हो जाते हैं और आस्था केंद्रों को भी संतुष्ट कर लेने में सफल हो जाते है। कभी आस्था के आधार पर न्याय और दण्ड व्यवस्था भी चलती थी, आस्था समाज व्यवस्था की धूरी हुआ करती थी, नीति और न्याय का संचालन भी करती थी। सत्ता और आस्था के बीच अपने-अपने अस्तित्व को बनाए रखने को लेकर मजबूत संधियाँ भी हुआ करती थी और अवसर के अनुरूप नए-नए रूप भी लिया करती थी। ऐसी संधियाँ सामाजिक अत्याचार, नैतिक शोषण और आर्थिक असमानता के कारण हुआ करती थी। आम लोगों को आस्था के सहारे रखकर उनके श्रम का शोषण और उन्हें कर्तव्य विमुख बना कर भाग्यधारित जीवन यापन के लिए बाध्य करके संपूर्ण उत्पादन को सत्ताधीन करना और सत्ता द्वारा लोगो में उत्पादन का आंशिक स्वेच्छापूर्वक वितरित करके वाहवाही लूटना और आस्था के सहारे अपने को दयालु, धर्मशील, न्यायप्रिय तथा प्रतापी होने का ढ़िढोरा पिटवाना और इसके लिए संचार माध्यमों को अनुकूल परिस्थितियां पैदा करने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निष्पक्ष बता कर अपने पक्ष के पोषण के लिए माहौल तैयार करना इसकी नीति रीति है। राजनीति में आस्था का प्रवेश मुख्य द्वार से नहीं होता अपितु चोर दरवाजे से होता है। सत्ता लोभी आस्था का मूल्य चुकाने के लिए तैयार रहते हैं, आम जनता में आस्था बढ़ाने के प्रयास किए जाते हैं, आस्था के ठेकेदारों से कारगर समझौते किए जाते हैं, इसमें आस्था और सत्ता एक दूसरे के लिए समर्पित भाव से लगे रहते हैं। आम जनता यदि इनके इस खेल को समझने में चूक जाती है या कोई चूक हो जाती है तो उसकी दशा वैसे ही हो जाती है जैसे दो पाटों के बीच…..। जिससे व्यक्ति, समाज और पूरे देश की मूल समस्या है पिसती रहने के लिए बाध्य हो जाती हैं।

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Shivji Pandey
शिवजी पाण्डेय ‘रसराज’




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