नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के मानकों को भी खुले तौर पर ठेंगा दिखा रहे बोर्ड के अफसर



बलिया : पापियों का पाप धोते धोते, राम तेरी गंगा मैली हो गयी। लेकिन गंगा कों सुरक्षित रखने के लिए गठित बोर्ड आँख बंद करके सो गयी। कटहल नाला के साथ यह पंक्तिया बखूबी चरितार्थ हो रही हैं। एक तरफ प्रदेश सरकार के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के पहल पर शहर के बीचो-बीच से होकर गुजरने वाला कटहल नाला कों सुधारने की क़वायद भूमिपूजन के बाद शुरू हो गया है। लेकिन उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अफसरों के उदासीनता के चलते आज भी लोगों के शौचालयों का मल मूत्र कटहल नाले में बहाया जा रहा है। जो अप्रत्यक्ष रूप से गंगा कों भी मैला कर रहा है। ऐसे में एनजीटी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के मानकों को भी खुले तौर पर ठेंगा दिखाया जा रहा है। यही नहीं इस प्रकरण में समाचार बैंक की खबर का संज्ञान लेते हुए एनजीटी नगर पालिका परिषद पर करोड़ों रूपये का जुर्माना भी ठोंका था।



प्रदूषण के चलते कटहल नाला से उठ रही दुर्गंध से हर कोई परेशान है. इस कटहल नाला को सुंदरीकारण करके जुहू चौपाटी का मुख्य रूप देने का वादा नगर विधायक दयाशंकर सिंह ने विस चुनाव से पहले किया था. वादा को पूरा करने की दिशा में कार्य शुरू हो चूका है। ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठने लगी है कि करोड़ों रुपये खर्च के बाद भी कटहल नाला में मांस, मछली के कचरे कों रोकने की दिशा में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी कोई ठोस कदम किसके दबाव में नहीं उठा रहे हैं।


सबसे दिलचस्प तो ये है कि एनजीटी सख्ती के बावजूद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के उदासीन रवैया के चलते मांस, मछली का कारोबार करने वाले लोग इसमें अपना कूड़ा, कचरा व गलीज प्रतिदिन कटहल नाला में फेंक देते हैं। इस क्षेत्र में ना तो कोई एनजीटी की गाइडलाइन काम कर रही है और नहीं प्रदूषण बोर्ड के अधिकारी ही कोई दिलचस्पी दिखा रहे है.