बलिया : अपूर्वा हॉस्पिटल प्रकरण में पुलिस द्वारा हत्या की धारा में डॉक्टर्स पर मुकदमा लिखे जाने पर नर्सिंग होम एसोसिएशन व आई एम ए के चिकित्सकों ने नाराजगी जताई, पत्रकारों से बोले, पुलिस जानबूझकर हत्या जैसे संगीन मुकदमे में डॉक्टर्स के खिलाफ मुकदमा दर्ज करती हैं। जिससे की चिकित्सा के क्षेत्र में अपना दहशत कायम रख सके।


कहा की हम उस युवा बेटी (श्रीमती अनीषा पाण्डेय) के असामयिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हैं। एक जीवन का जाना केवल एक परिवार की क्षति नहीं है, एक डॉक्टर के लिए भी यह सबसे बड़ी विफलता और व्यक्तिगत दुख का क्षण होता है। हमारी संवेदनाएं शोकाकुल परिवार के साथ हैं और हम ईश्वर से उनकी शांति की प्रार्थना करते हैं।
लेकिन, आज हमें यहाँ कुछ कड़वे तथ्यों और कानूनी विसंगतियों पर बात करनी पड़ रही है…
हमारा उद्देश्य यहाँ किसी को बचाना नहीं, बल्कि 'न्याय' और 'सत्य' की मांग करना है।
डॉक्टर और हत्यारे के बीच का अंतर
पुलिस ने इस मामले में BNS की धारा 103 (हत्या) के तहत मुकदमा दर्ज किया है। हम प्रशासन से पूछना चाहते हैं—क्या एक डॉक्टर, जो दिन-रात जीवन बचाने की शपथ लेकर काम करता है, वह अचानक 'हत्यारा' कैसे हो गया? हत्या का अर्थ है 'मारने का इरादा'। क्या किसी भी डॉक्टर का इरादा अपने मरीज को मारना हो सकता है?
ऑपरेशन थिएटर में जटिलताएं (Complications) किसी के भी साथ हो सकती हैं। लेजर सर्जरी के दौरान अगर डॉक्टर को लगा कि मरीज की जान बचाने के लिए 'ओपन सर्जरी' जरूरी है, तो वह एक 'Life-saving clinical decision' था, न कि हत्या की कोई साजिश।1कानून और सर्वोच्च न्यायालय की अनदेखी
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 'जैकब मैथ्यू' केस में स्पष्ट कहा है कि किसी भी डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगाने से पहले एक विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड की राय लेना अनिवार्य है। बलिया पुलिस ने बिना किसी मेडिकल जांच के, बिना किसी तकनीकी राय के, सीधे 'मर्डर' की धारा लगा दी। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि पूरे जिले के चिकित्सा तंत्र को डराने और पंगु बनाने की कोशिश है।
जनता और प्रशासन से हमारी अपील
अगर आज इलाज के दौरान हुई मौत को 'हत्या' मानकर डॉक्टरों को जेल भेजा जाएगा, तो कल कोई भी डॉक्टर किसी गंभीर मरीज को छूने की हिम्मत नहीं करेगा। इससे अंततः समाज और मरीजों का ही नुकसान होगा।
हमारी मांगें स्पष्ट हैं:
- हम जांच के खिलाफ नहीं हैं, हम 'गलत धाराओं' और 'बिना जांच की कार्रवाई' के खिलाफ हैं।
- तत्काल एक उच्च स्तरीय न्यूट्रल मेडिकल बोर्ड गठित किया जाए जो मौत के सही कारणों का पता लगाए।
- जब तक बोर्ड की रिपोर्ट न आए, तब तक किसी भी डॉक्टर के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई रोकी जाए।
हम पीड़ित परिवार के साथ हैं और चाहते हैं कि सच सामने आए, लेकिन सच 'भीड़ के दबाव' या 'पुलिस की मनमानी' से नहीं, बल्कि 'विज्ञान और कानून' से सामने आना चाहिए।
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