प्रकरण के विवेचक को तलब कर पुरा प्रकरण स्पष्ट करने का दिया निर्देश
बलिया : अपूर्वा हॉस्पिटल प्रकरण में बलिया नर्सिंग होम एसोसिएशन व बलिया मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) बलिया का संयुक्त प्रतिनिधिमण्डल जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह से गुरुवार की शाम उनके आवास पर मिला। इस अपूर्वा हॉस्पिटल में हुई घटना की जानकारी देते हुए हॉस्पिटल को विधिक नियमों के विपरीत सील करने तथा चार चिकित्सकों एवं एक स्वर्ग सिधार चुके चिकित्सक के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किये जाने की जानकारी देते हुए न्याय की मांग पत्र सौंपा। जिसपर डीएम ने न्याय का भरोसा दिलाया।
एसोसिएशन के चिकित्सकों ने डीएम से वार्ता के दौरान बताया कि हम सभी उस युवा बेटी (श्रीमती अनीषा पाण्डेय) के असामयिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हैं। एक जीवन का जाना केवल एक परिवार की क्षति नहीं है, एक डॉक्टर के लिए भी यह सबसे बड़ी विफलता और व्यक्तिगत दु:ख का क्षण होता है। हमारी संवेदनाएं शोकाकुल परिवार के साथ हैं और हम ईश्वर से उनकी शांति की प्रार्थना करते हैं। लेकिन, आज हमें यहाँ कुछ कड़वे तथ्यों और कानूनी विसंगतियों पर बात करनी पड़ रही है।
हमारा उद्देश्य यहाँ किसी को बचाना नहीं, बल्कि ‘न्याय’ और ‘सत्य’ की मांग करना है।
1. डॉक्टर और हत्यारे के बीच का अंतर
पुलिस ने इस मामले में बीएनएस की धारा 103 (1) के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज किया है। हम प्रशासन से पूछना चाहते हैं—क्या एक डॉक्टर, जो दिन-रात जीवन बचाने की शपथ लेकर काम करता है, वह अचानक ‘हत्यारा’ कैसे हो गया? हत्या का अर्थ है ‘मारने का इरादा’। क्या किसी भी डॉक्टर का इरादा अपने मरीज को मारना हो सकता है? चिकित्सकों ने
ऑपरेशन थिएटर में जटिलताएं भी बताया कहा कि (Complications) किसी के भी साथ हो सकती हैं। लेपरोस्कोपिक सर्जरी के दौरान अगर डॉक्टर को लगा कि मरीज की जान बचाने के लिए ‘ओपन सर्जरी’ जरूरी है, तो वह एक ‘Life-saving clinical decision’ था, न कि हत्या की कोई साजिश।
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2. कानून और सर्वोच्च न्यायालय की अनदेखी
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ‘जैकब मैथ्यू’ केस में स्पष्ट कहा है कि किसी भी डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगाने से पहले एक विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड की राय लेना अनिवार्य है। बलिया पुलिस ने बिना किसी मेडिकल जांच के, बिना किसी तकनीकी राय के, सीधे ‘मर्डर’ की धारा लगा दी। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि पूरे जिले के चिकित्सा तंत्र को डराने और पंगु बनाने की कोशिश है।
3. जनता और प्रशासन से हमारी अपील
अगर आज इलाज के दौरान हुई मौत को ‘हत्या’ मानकर डॉक्टरों को जेल भेजा जाएगा, तो कल कोई भी डॉक्टर किसी गंभीर मरीज को छूने की हिम्मत नहीं करेगा। इससे अंततः समाज और मरीजों का ही नुकसान होगा।
हमारी मांगें स्पष्ट हैं:
• हम जांच के खिलाफ नहीं हैं, हम ‘गलत धाराओं’ और ‘बिना जांच की कार्रवाई’ के खिलाफ हैं।
• तत्काल एक उच्च स्तरीय न्यूट्रल मेडिकल बोर्ड गठित किया जाए जो मौत के सही कारणों का पता लगाए।
• जब तक बोर्ड की रिपोर्ट न आए, तब तक किसी भी डॉक्टर के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई रोकी जाए।
हम पीड़ित परिवार के साथ हैं और चाहते हैं कि सच सामने आए, लेकिन सच ‘भीड़ के दबाव’ या ‘पुलिस की मनमानी’ से नहीं, बल्कि ‘विज्ञान और कानून’ से सामने आना चाहिए।
पूरा प्रकरण प्रतिनिधिमण्डल से सुनने के बाद भरोसा दिलाया कि इस प्रकरण में उन्हें गलत जानकारी डी गयी। लोगों के दबाव में गलत कार्रवाई नहीं कि जाएगी।
अस्पतालों की जाँच में भी आईएमए का भी होगा एक सदस्य
जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने कहा कि अस्पतालों एवं नर्सिंग होम की जांच करने निकली टीम के साथ बलिया मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए बलिया ) का एक सदस्य शामिल किया जाएगा। जिससे कि टीम के सदस्य किसी प्रकार की ज्यादती नर्सिंग होम या हॉस्पिटल के संचालक के साथ न कर सके।
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