विवेक पांडेय वरिष्ठ पत्रकार

जब मैं बात करता हूं कि हमें अपने खाने पर ध्यान देना होगा और अपने पुराने खानों की तरफ धीरे-धीरे बढ़ना ही होगा. तो कुछ लोग पिछड़ा समझते हैं, यही नहीं मेरा एक लेख 'रसोई का किचन हो जाना' भी कई लोगों को नगवार गुजरा था. लेकिन, यकीन मानिए हम लोगों के दिमाग को 'स्वाद का गुलाम' बना लिया गया है. यह स्वाद भी प्राकृतिक नहीं है. बचपन से चीनी का जहर यह कंपनियां घोल रही हैं और अब बड़े मसाले वाली कंपनियों ने भी ऐसे कैमिकल छिपा कर रखे थे जो कैंसर का कारक बन रहा है.
घरों में मसाले सभी इस्तेमाल करते हैं चाहें वो वेजीटेरियन हों या नॉन वेज. जहर तो आपके मसालों तक में है. ऐसे में यह खाद्य प्रदूषण या खाद्य आतंक नहीं तो क्या ? इसके साथ ही इस देश में हर गली में भर-भर कर फूड ब्लॉगर घूम रहे हैं. जिन्हें न स्वाद का असली रूप पता है और न ही स्वास्थ्य का. न दांत का न आंत का … अगर इनमें से कुछ लोग फुटपाथ से लेकर बड़े रेस्टोरेंटों तक की पोल खोलें तो क्या काम नहीं होगा ? मुझे लगता है अब इस तरह का ऑपरेशन होना ही चाहिए. मेरा यह ब्लॉग चलाने का मकसद ही है कि मैं आपको याद दिला सकूं कि आप जो खाना भूल गए हैं वह कैसे अपनी रसोई में वापस लेकर आएं. कैसे आप मसालों के इस आतंक से बच सकते हैं. अगर आप अपना देसी खाना खाते हैं तो यकीन मानिए कम मसालों की भी जरूरत पड़ती है.
आपको बस कुछ खास-बेसिक चीजों का ध्यान रखना होता है. खाने में अगर 'समय' नहीं डाल सकते हैं तो कम से कम 'बाजार' भी मत डालिए. बाजार क्षणिक स्वाद तो ला सकता है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम मौत तक हो सकता है. खाने पर सबसे ज्यादा ध्यान होना चाहिए. पैसा और समय यह दो करेंसी है संसार की, इसमें से दोनों जितना दे सकते हैं खाने को दीजिए. थोड़ी से प्लानिंग से आप खाना भी बचा सकते हैं.मैंने यह मुहिम शुरू की हुई है, यह चलती रहेगी. अलग-अलग माध्यम से यह याद दिलाता रहूंगा. लेकिन, कहना यही है कि आप अपने खाने को ध्यान में रखें. खोजें अपने घर की रसोई, इसे अपने मकान में जगह दें ...
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