विवेक पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

बलिया/नईदिल्ली: चुनावी महौल पूरा गरम हो चुका है और पहले चरण की तैयारी भी पूरी हो चुकी है. जल्द ही पहले चरण का प्रचार भी बंद हो जाएगा और उम्मीदवारों की किस्मत EVM में कैद हो जाएगी. लेकिन, बाकी के छह चरणों की तैयारी तो करनी होगी. इन चुनावों की खास बात यह है कि पक्ष हो या विपक्ष सभी राष्ट्रीय स्तर पर ही मुद्दों को समेट कर चुनाव लड़ना चाहते हैं.

जहां भाजपा मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है वहीं पूरा विपक्ष सिर्फ मोदी जी के विरोध पर. इस स्थिति के कुछ अपने फायदे हैं तो कुछ नुकसान. सबसे बड़ा नुकसान यह है कि स्थानीय लीडरशिप खत्म हो रही है. स्थानीय नेता क्षेत्र और वहां को लोगों को कुछ समझ ही नहीं रहे हैं. मेहनत भी अपेक्षाकृत कम हो रही है, प्रयास भी कम होता दिख रहा है.

दोनों ही पक्ष बस अपने-अपने नेशनल ब्रांड का मुंह ताकते हुए वोट पाने की उम्मीद लगा कर बैठे हैं. जबकि, यह नेशनल लीडरशिप के लिए भी अच्छा नहीं है कि उनके नेता का कनेक्ट लोकल स्तर पर खत्म या कम हो जाए. टिकटों को बांटने में हो रही देरी भी इसका एक बड़ा उदाहरण है कि कैसे "सीट तो निकल ही जाएगी" की मानसिकता काम कर रही है.

यकीन मानिए अगर सिर्फ भाजपा की बात करूं तो इनके उम्मीदवार अपने प्रधानमंत्री के अपेक्षाकृत 50 प्रतिशत भी मेहनत से साथ मैदान में नहीं हैं. सबको बस उम्मीद है कि मोदी जी के नाम पर वोट मिल जाएगा. काफी हद तक यह सही भी है लेकिन ऐसे नेता एक बात तो करेंगे ही कि जीत का मार्जिन कम कर देंगे. इसका असर वोट परसेंटेज पर भी पड़ेगा. जिससे जनता के बीच पेनीट्रेशन कम होगा.

यही नहीं अगर समर्थक सोशल मीडिया पर लाइक/शेयर से ही थक गए और वोट देने के लिए निकले ही नहीं तो दांव उल्टा भी पड़ सकता है. क्योंकि, विपक्ष के वोटर तो वोट देने जा ही रहे हैं. ऐसे में भाजपा नेताओं की सबसे बड़ी चुनौती समर्थन में हवा बनाना नहीं है, वह तो है, लेकिन वोटर्स को निकाल कर वोट दिलाने की है. इसके लिए मेहनत तो लगेगी.