बलिया। बदलते दौर में जब युवा पीढ़ी सोशल मीडिया की रीलों में व्यस्त है, वहीं बलिया की बेटियां धर्म और संस्कृति से जुड़ी पारंपरिक कला को सीखकर नई मिसाल पेश करने की तैयारी में जुटी हैं। शहर के राजपूत नेवरी हनुमान मंदिर पर 17 बेटियां डमरू और झाल बजाने का प्रशिक्षण ले रही हैं, जो रक्षाबंधन पर्व पर नगर में निकलने वाले महावीरी झंडा जुलूस में सामूहिक रूप से अपनी कला का प्रदर्शन करेंगी।

खास बात यह है कि महावीरी झंडा जुलूस में पहली बार बेटियां समूह में एक ही धुन पर डमरू और झाल बजाती नजर आएंगी। इसके लिए बेटियों को श्री भृगु क्षेत्र भक्त मंडल (डमरू दल) के संस्थापक एवं गुरु अभय पटेल शास्त्रीय प्रशिक्षण दे रहे हैं। प्रशिक्षण प्रतिदिन शाम छह से रात आठ बजे तक राजपूत नेवरी हनुमान मंदिर पर चल रहा है।

प्रशिक्षण लेने वाली बेटियां जुलूस में पारंपरिक मद्रासी परिधान और डमरू के साथ नजर आएंगी। बेटियों की इस पहल को उनके परिवारों का भी पूरा समर्थन मिल रहा है। हालांकि प्रशिक्षण के लिए उचित स्थान उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रशिक्षुओं ने जिला प्रशासन से प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराने की मांग की है।

2022 से बच्चों को प्रशिक्षण दे रहा डमरू दल

श्री भृगु क्षेत्र भक्त मंडल (डमरू दल) लंबे समय से बच्चों को डमरू और झाल बजाने की कला का प्रशिक्षण दे रहा है। मंडल में करीब 55 बच्चे जनवरी 2022 से प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। ये बच्चे महाशिवरात्रि सहित विभिन्न धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके हैं।

बच्चों को प्रशिक्षण भृगु बाबा मंदिर परिसर में रात करीब 9 बजे से 10:30 बजे तक गुरु अभय पटेल शास्त्रीय द्वारा दिया जाता है। अब बेटियों की नई टोली के जुड़ने से इस पारंपरिक कला को नई ऊर्जा मिली है।

  सीखने की ललक बेटियों में 

प्रीति यादव ने बताया कि उन्होंने महाशिवरात्रि के जुलूस में डमरू दल का प्रदर्शन देखा था। इसके बाद उनके मन में भी डमरू सीखने की इच्छा जगी और उन्होंने टीम के गुरु से संपर्क किया। अब वह उनके सानिध्य में नियमित प्रशिक्षण ले रही हैं।

संजना कुमारी ने बताया कि इंस्टाग्राम और फेसबुक पर डमरू बजाने के वीडियो देखने के बाद उनके मन में इसे सीखने की जिज्ञासा पैदा हुई। इसके बाद उन्होंने डमरू दल से संपर्क किया और अब प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं।

शिल्पी ने बताया कि शिव बारात में डमरू बजाते बच्चों को देखकर उन्हें यह कला सीखने की इच्छा हुई। उन्होंने माता-पिता से अपनी इच्छा बताई और परिवार की अनुमति मिलने के बाद प्रशिक्षण शुरू किया।

वहीं अंजली कुमारी ने बताया कि शिव बारात में डमरू बजाते देखकर उन्हें यह कला काफी पसंद आई। परिवार से बात करने के बाद उन्हें सीखने की अनुमति मिली और वह वर्ष 2024 से गुरु अभय पटेल शास्त्रीय के सानिध्य में प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं।

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परंपरा से जुड़ रही बेटियां, बदल रही सोच

बेटियों का यह प्रयास न केवल धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने की पहल है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि इच्छाशक्ति और परिवार के सहयोग से बेटियां किसी भी पारंपरिक कला में अपनी पहचान बना सकती हैं। रक्षाबंधन पर महावीरी झंडा जुलूस में इन बेटियों का डमरू-झाल प्रदर्शन आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनने की उम्मीद है।