दैनिक भास्कर की अंडरकवर जांच में प्रयागराज में चौंकाने वाले दावे, कोचिंग और हॉस्टल की फीस जुटाने के लिए छात्र उठा रहे जोखिम
प्रयागराज/लखनऊ : विभिन्न प्रकार के प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की मुश्किलें अब एक गंभीर सामाजिक चिंता के रूप में सामने आ रही हैं। दैनिक भास्कर की अक्टूबर 2026 की बताई गई अंडरकवर जांच रिपोर्ट के मुताबिक, प्रयागराज में कुछ छात्र कोचिंग, हॉस्टल और मेस का खर्च जुटाने के लिए पैसे के बदले रक्त देने को तैयार मिले। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ छात्र महीने में दो से चार बार तक ऐसा कर रहे हैं। यदि ये दावे जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह शिक्षा की बढ़ती लागत और जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए आर्थिक सहायता की कमी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
फीस चुकाने के लिए आर्थिक तंगी से जूझ रहे छात्र
रिपोर्ट के अनुसार, प्रयागराज के राजापुर चौराहे स्थित इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन (एएमए) ब्लड बैंक के बाहर अंडरकवर रिपोर्टरों ने छात्रों से बातचीत की। इसमें एसएससी और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे कुछ विद्यार्थियों ने आर्थिक तंगी के चलते पैसे के बदले रक्त देने की बात कही।
रिपोर्ट में एक एसएससी अभ्यर्थी की परेशानी का उल्लेख है, जो कथित तौर पर दो महीने से हॉस्टल की फीस नहीं दे पाया था। उसने अपनी पारिवारिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए पढ़ाई जारी रखने की मजबूरी बताई। एक अन्य छात्र ने मेस का बकाया चुकाने के लिए कुछ दिन पहले रक्त देने और फिर कोचिंग फीस की जरूरत पड़ने पर दोबारा ऐसा करने की बात कही।
नीट की तैयारी कर रहे एक अन्य छात्र ने कथित तौर पर बताया कि उसके पिता ने पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए खेत गिरवी रख दिया है और परिवार कर्ज के बोझ से जूझ रहा है।
कोचिंग, हॉस्टल और खाने का खर्च बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में निजी कोचिंग संस्थानों की सालाना फीस लगभग 1.20 लाख से 1.80 लाख रुपये तक बताई गई है। इसके अलावा हॉस्टल के कमरे का किराया, भोजन, किताबें और अध्ययन सामग्री का खर्च भी छात्रों को उठाना पड़ता है।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों के लिए ये खर्च बड़ी बाधा बन सकते हैं। सरकार की मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना जैसी निःशुल्क कोचिंग पहल मौजूद है, लेकिन पात्रता, उपलब्ध सीटों और अन्य व्यावहारिक सीमाओं के कारण हर जरूरतमंद विद्यार्थी तक इसका लाभ पहुंच पाना चुनौती बना रहता है।
रक्त की खरीद-फरोख्त के आरोप, जांच जरूरी
दैनिक भास्कर की बताई गई जांच में कथित एजेंटों के जरिए रक्त उपलब्ध कराने, प्रोसेसिंग शुल्क वसूलने और दस्तावेजों के दुरुपयोग जैसे आरोपों का भी उल्लेख है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का आधिकारिक जांच के जरिए सत्यापन जरूरी है। किसी ब्लड बैंक या व्यक्ति की संलिप्तता को ठोस साक्ष्य के बिना स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
भारत में रक्तदान स्वैच्छिक और गैर-वाणिज्यिक व्यवस्था के तहत किया जाता है। पैसे के बदले रक्तदान कराने की व्यवस्था गंभीर कानूनी और नियामकीय सवाल खड़े करती है। संबंधित अधिकारियों को ऐसे मामलों की जांच कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जरूरतमंद मरीजों को सुरक्षित रक्त मिले और विद्यार्थियों का आर्थिक शोषण न हो।
बार-बार रक्त देना स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण
रक्तदान निर्धारित स्वास्थ्य मानकों, न्यूनतम अंतराल और चिकित्सकीय जांच के अनुसार ही किया जाना चाहिए। बार-बार या अनुचित अंतराल पर रक्त देने से आयरन की कमी, एनीमिया, कमजोरी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। आर्थिक मजबूरी में छात्रों का अपने स्वास्थ्य को जोखिम में डालना विशेष चिंता का विषय है।
सवाल सिर्फ रक्त बेचने का नहीं, शिक्षा की पहुंच का भी है
यह मामला केवल कथित अवैध रक्त कारोबार तक सीमित नहीं है। इसके पीछे गरीब परिवारों के विद्यार्थियों की आर्थिक कठिनाइयां, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बढ़ता खर्च और शिक्षा के अवसरों तक समान पहुंच का सवाल भी जुड़ा है।
जरूरत है कि सरकार और प्रशासन जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, सस्ती छात्रावास सुविधा, भोजन सहायता और निःशुल्क प्रतियोगी परीक्षा तैयारी के अवसर बढ़ाएं। साथ ही, रक्त की कथित खरीद-फरोख्त के मामलों की निष्पक्ष जांच कर दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
बड़ा सवाल: क्या आर्थिक तंगी से जूझ रहे विद्यार्थियों को पढ़ाई जारी रखने के लिए ऐसी सहायता मिल पाएगी कि उन्हें अपना स्वास्थ्य जोखिम में डालने की नौबत ही न आए?
स्रोत संबंधी टिप्पणी: यह समाचार उपलब्ध कराए गए दैनिक भास्कर की कथित अंडरकवर रिपोर्ट के विवरण पर आधारित है। प्रकाशन से पहले मूल रिपोर्ट, आंकड़ों और कानूनी प्रावधानों का सत्यापन कर लें।
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