बलिया। जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 2016 में बलिया के बसंतपुर स्थित उसी ऐतिहासिक शहीद स्मारक परिसर में हुई, जहां पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वीर शहीदों की स्मृतियों को संरक्षित करने का प्रयास किया था। लेकिन आज इसी परिसर की शहीद गैलरी का बंद रहना गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
1942 के ‘बलिया बलिदान दिवस’ और देश की आजादी के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बलिया, मिदनापुर और सतारा की क्रांतिकारी विरासत को सामने लाने के उद्देश्य से विकसित यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणास्थल बन सकता था। इसके बावजूद शहीद गैलरी का बंद रहना उस विरासत के संरक्षण को लेकर चिंता पैदा करता है।
विश्वविद्यालय के विकास और बुनियादी ढांचे के लिए समय-समय पर सरकार की ओर से बजट भी स्वीकृत हुआ। वर्ष 2021 में विश्वविद्यालय के विकास के लिए 92.39 करोड़ रुपये की मंजूरी का उल्लेख मिलता है। इसके बावजूद शहीद गैलरी और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के मूल विजन को प्रभावी ढंग से पुनर्जीवित करने की जरूरत आज भी बनी हुई है।
‘बागी बलिया’ की पहचान अन्याय और उपेक्षा के खिलाफ आवाज उठाने की रही है। ऐसे में सवाल केवल एक गैलरी के बंद होने का नहीं, बल्कि शहीदों की स्मृतियों और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की जिम्मेदारी का है।
इस धरोहर को संवारने की जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ-साथ शासन, जनप्रतिनिधियों, स्थानीय समाज और चंद्रशेखर की विरासत से जुड़े लोगों की भी है। जरूरत है कि शहीद गैलरी को फिर से खोला जाए, उसका संरक्षण और आधुनिकीकरण हो तथा नई पीढ़ी को बलिया के स्वतंत्रता आंदोलन और शहीदों के योगदान से परिचित कराने के लिए इसे जीवंत बनाया जाए।
अब ताले से बड़ा सवाल—जवाबदेह कौन?
शहीद गैलरी बंद है तो किसकी अनुमति से? किसकी जिम्मेदारी में? और कब तक?
जिस धरोहर पर सरकारी धन लगा, उसके संरक्षण और संचालन की जिम्मेदारी किस संस्था की है? यदि गैलरी बंद है तो इसकी निगरानी किसने की, स्थिति की समीक्षा कब हुई और इसे दोबारा खोलने के लिए अब तक क्या कार्रवाई हुई?
विश्वविद्यालय प्रशासन क्या इसे अपनी जिम्मेदारी मानता है? उच्च शिक्षा विभाग के स्तर पर क्या कोई व्यवस्था तय है? संस्कृति विभाग के पास इसकी देखरेख का क्या दायित्व है? जिला प्रशासन ने इसकी स्थिति पर कब संज्ञान लिया? और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस विरासत को लेकर शासन के सामने क्या पहल की?
सबसे बड़ा सवाल-क्या किसी अधिकारी या संस्था की जवाबदेही तय हुई है?
बलिया की जनता को अब सिर्फ यह सुनना पर्याप्त नहीं कि शहीद गैलरी कभी खुलेगी। जरूरत है कि जिम्मेदार संस्था सामने आए, बंद रहने का कारण सार्वजनिक हो, संरक्षण की योजना घोषित हो और गैलरी खोलने की स्पष्ट समयसीमा तय की जाए।
क्योंकि शहीदों की विरासत पर लगा ताला सिर्फ एक दरवाजा बंद नहीं करता—वह व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
और ‘बागी बलिया’ आज यही पूछ रहा है—इतिहास को बंद रखने का जिम्मेदार कौन है और उसे खोलने की जवाबदेही किसकी है?
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