
नईदिल्ली: पिछले दो तीन सालों से उतर प्रदेश में प्रियंका गांधी सक्रियता क्या वाकई कांग्रेस को 2022 के चुनाव में विजय दिलाने के लिए है या फिर दरअसल यह लड़ाई कांग्रेस की खोई हुई जमीन वापस दिलाने के लिए है।
'लड़की हूं लड़ सकती हुं' यह नारा देने वाली प्रियंका गांधी कांग्रेस को उसकी खोई जमीन को वापस दिलाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही हैं, पिछले दो तीन सालों में उन्होंने जो मेहनत की है उससे कांग्रेस राजनीतिक जमीन वापस मिली है या नहीं मिली है यह तो चुनाव के बाद देखने को मिलेगा, लेकिन पिछले तीन सालों में करोना महामारी के दौरान जिस प्रकार जमीन की राजनीति प्रियंका गांधी ने की है चाहे वो दलितों के बीच जाकर मिलना या फिर बलात्कार पीड़ितों के परिवार वालों से मिलकर संतावना देना हो, उसने निश्चित रूप से कांग्रेस को और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जगाया है, और जहां तक बात है चुनाव परिणाम की तो 2022 की विधानसभा चुनाव में बेशक कांग्रेस की सीटें बढ़े या ना बढ़े लेकिन प्रियंका की कोशिश कांग्रेस की जमीन तैयार करने की है और जिस तरीके से कांग्रेस कार्यकर्ता जो एक तरह से उत्तर प्रदेश की राजनीति में सुसुप्त अवस्था में चले गए थे। वह वापस जागने लगे हैं। शायद प्रियंका गांधी की यही कोशिश भी यही है की जो जमीन कांग्रेस ने, तमाम क्षेत्रीय दलों चाहे वह सपा हो या बसपा के साथ गठबंधन करके खोई की उसे वापस पाए।

कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति का सबसे ज्यादा नुकसान उत्तर प्रदेश में ही हुआ। दरअसल हर जिले का कार्यकर्ता इस उम्मीद के साथ पांच साल मेहनत करता है कि अगले चुनाव में उसे या उसके पसंदीदा उम्मीदवार को टिकट मिलेगा और वह चुनाव जीतकर के संसद या विधानसभा में जाएगा। परंतु जब पार्टी गठबंधन कर लेती हैं तो अगले चुनाव आने तक उनका भविष्य खतरे में पड़ जाता है और उसका मनोबल टूटता है तथा धीरे-धीरे सभी क्षेत्रों से पार्टी का कैडर ही समाप्त हो जाता है और दोबारा वहां पार्टी को खड़ा करने में एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है। यही हाल आजकल कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में है। दरअसल गठबंधन की राजनीति करते करते कब कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन खो दी यह उनके बड़े-बड़े नेताओं को भी पता नहीं चल सका। आज हालात यह है कि कांग्रेस चाहे कितनी भी दलील देती रहे कि वह राष्ट्रीय पार्टी है परंतु हकीकत यह है कि अधिकतर राज्यों में कांग्रेस की हालत क्षेत्रीय दलों से भी ज्यादा खराब है और वह क्षेत्रीय दलों के साथ दूसरे तीसरे नंबर की पार्टी बनकर गठबंधन करने को मजबूर है।
उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की कोशिश यही है कि उत्तर प्रदेश में सोए हुए कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जगाया जाए और उनमें फिर से जान फूंकी जाए तथा कांग्रेस का खोया हुआ सम्मान एवं खोई हुई जमीन वापस प्राप्त की जाए। जिस तरीके से मायावती इस चुनाव में अपने आप को हासिए पर रख रहें हैं और चुनाव प्रचार से दूरी बनाकर रख रही है, अगर प्रियंका गांधी कांग्रेस को वापस उत्तर प्रदेश की राजनीति में जगह दी गाने में कामयाब हो जाएं तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। फिलहाल तो मंजिल बहुत दूर है। आज की राजनीति को ध्यान में रखते हुए यह कहने में कोई किंतु परंतु नहीं है कि उत्तर प्रदेश में मुख्य लड़ाई भाजपा एवं सपा गठबंधन के मध्य ही है और बसपा तथा कांग्रेस किनारे रहकर चुनाव नतीजों के आने का इंतजार कर रहे हैं।
कांग्रेस को अगर अपना वजूद बचाए रखना है तो उसे अन्य राज्यों जैसे कि पश्चिम बंगाल, बिहार, कर्नाटक, उड़ीसा आदि में भी प्रियंका गांधी जैसी रणनीति अपनानी होगी चाहे वह चुनाव जीते या ना जीते परंतु अधिक से अधिक सीटों पर उन्हें अपना प्रत्याशी खड़ा करना होगा, तभी वह अपने खोए हुए जनाधार तथा कार्यकर्ताओं के खोए हुए आत्मविश्वास को वापस ला सकेगी तथा फिर से राष्ट्रीय राजनीति में बुलंदी पर पहुंच सके सकेगी। फिलहाल तो यह मोदी-शाह का युग है और भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने आप को राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख खिलाड़ी बनाने में इन्ही सब बातों का ध्यान रखा और अपने कार्यकर्ताओं को खड़ा करने में पूरा ध्यान लगाया तभी आज की तारीख में अपने आप को एक तरह से अपराजेय बना करके रखा है।
2022 की विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रियंका गांधी का सहारा लेकर कितनी कामयाबी हासिल करती है यह तो 10 मार्च को पता चलेगा। परंतु हार हो या जीत प्रियंका गांधी ने कांग्रेस के पुनरोत्थान के लिए जो प्रयास किया है वह निश्चित रूप से आने वाले चुनावों में कांग्रेस को और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के मनोबल को हौसला प्रधान करेंगे।

अमित कुमार श्रीवास्तव