• अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब, उमाशंकर सिंह को जननायक कहने को विवश हुआ बलिया

पैतृक गांव खनवर से बलिया तक सड़कों पर उमड़ा जनसमुद्र, दलगत सीमाएं टूटीं; नम आंखों से लोगों ने दी प्रिय नेता को अंतिम विदाई
बलिया। जिले के विधायक उमाशंकर सिंह के पैतृक गांव खनवर से निकली अंतिम यात्रा में उमड़े जनसैलाब ने उनके जनाधार और लोकप्रियता की गहरी तस्वीर पेश की। अंतिम दर्शन के लिए उमड़ी भारी भीड़ को देखकर हर किसी की जुबान पर यही सवाल था कि आखिर एक जनप्रतिनिधि के प्रति इतना व्यापक जनसमर्थनकैसे संभव हुआ। खनवर की धरती पर उमड़ा जनसैलाब इस बात का प्रमाण नजर आया कि उमाशंकर सिंह महज एक विधायक नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में लोगों के दिलों में बसे जननेता थे।
अंतिम यात्रा में हर दल, हर धर्म और हर वर्ग के लोग नम आंखों के साथ शामिल हुए। लोगों का कहना था कि उमाशंकर सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन में जाति, धर्म और दलगत पहचान से ऊपर उठकर लोगों को इंसानियत के आधार पर अपनाया। गरीबों की मदद, जरूरतमंदों की आवाज बनने और लोगों के सुख-दुःख में खड़े रहने की उनकी कार्यशैली ने उन्हें आमजन से जोड़ा।
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नगरा से बलिया तक सड़कें बनीं जनसैलाब की गवाह

उमाशंकर सिंह की अंतिम यात्रा के दौरान खनवर, सलेमपुर, इंदरपुर, चोगड़ा, हजौली, चिलकहर, औंदी, पियारिया, सिंहाचवर, सिंहपुर, फेफना से लेकर बलिया तक रास्ते में बड़ी संख्या में लोग अंतिम दर्शन के लिए उमड़ते रहे। कई स्थानों पर लोग घंटों इंतजार करते नजर आए।
बलिया शहर में भी विभिन्न मार्गों पर लोगों की भारी भीड़ जमा रही। हर कोई अपने प्रिय नेता की अंतिम झलक पाने को आतुर दिखाई दिया। अंतिम यात्रा के दौरान उमड़ी भीड़ ने राजनीतिक सीमाओं से परे उमाशंकर सिंह के प्रति लोगों के भावनात्मक जुड़ाव को सामने ला दिया।
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प्रदेश की राजनीति में अपने सेवा भाव की अमिट छाप छोड़ने वाले उमाशंकर सिंह के निधन से क्षेत्र में शोक की लहर है। उनके अंतिम दर्शन के दौरान राजनीतिक दलों की सीमाएं भी धुंधली नजर आईं। समर्थकों के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोग भी उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे।
गरीबों के मसीहा, जरूरतमंदों की आवाज और अनेक परिवारों के सहारे के रूप में याद किए जाने वाले उमाशंकर सिंह आज पंचतत्व में विलीन हो गए। लेकिन उनका संघर्ष, सादगी, सेवा भावना और जनता के प्रति उनका अथाह प्रेम लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेगा।
रसड़ा ही नहीं, पूरा क्षेत्र आज खुद को एक बड़े जननेता की कमी से अनाथ महसूस कर रहा है.