बलिया। अंततः एक योद्धा ने अलविदा कह दिया…किरदार के अंत में उसके हिस्से वह आया, जिसकी हर जनसेवक को जीवनभर चाहत होती है। लोग उसकी कमाई का हिसाब लगाते रहे, लेकिन आज जनपद बलिया की सड़कों पर उमड़ी जनभावना ने उसकी सबसे बड़ी कमाई के सबूत पेश कर दिए।

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कुदरत की बरसात और खनवर से बलिया तक हर चौराहे पर उमड़ा जनसैलाब… आंखों में आंसू और दिल में दर्द लिए विदा होता एक जनयोद्धा। यह मंजर बलिया के हिस्से कभी न आए। बलिया की माटी ने एक से बढ़कर एक नेता पैदा किए हैं, लेकिन जमीनी भावनाओं का

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ऐसा सैलाब शायद ही किसी और के हिस्से आया हो।


अभी लाखों लोग इस भीड़ का हिस्सा नहीं हैं। मगर घरों में बैठे वे लोग भी अपने-अपने तरीके से इस पीड़ा को महसूस कर रहे हैं। किसी के घर का चूल्हा नहीं जला, किसी ने उपवास रखा, तो किसी की आंखों से निकले आंसुओं ने अपने प्रिय नेता के प्रति अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की।

छात्र राजनीति की गलियों से निकला एक साधारण नौजवान जब प्रदेश के राजनीतिक फलक पर अपनी पहचान बनाते हुए आगे बढ़ा, तब भी उसने अपनी जमीन से कभी अपने कदम नहीं हटाए। अथक मेहनत, कुशल नेतृत्व और आर्थिक उदारीकरण के बाद बदलते राजनीतिक परिवेश की गहरी समझ ने उसे अलग पहचान दी। व्यापार जगत में भी उसने अपनी क्षमता का लोहा मनवाया, लेकिन सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी हृदय को अहंकार से दूर और स्वभाव को शांत रखा।

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कुदरत ने सफर लंबा नहीं किया, लेकिन उस सफर की व्यापकता और उसकी छोड़ी हुई छाप बहुत गहरी है।

आज इसी अद्भुत करुणा के सागर में डूबे पूरे बलिया ने अपने हिस्से का प्यार अपने जनयोद्धा को समर्पित किया। सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब मानो यही कह रहा था-

अंततः एक योद्धा ने अलविदा कह दिया…किरदार के अंत में उसके हिस्से वह आया, जिसकी हर जनसेवक को जीवनभर चाहत होती है। लोग उसकी कमाई का हिसाब लगाते रहे, लेकिन आज जनपद बलिया की सड़कों पर उमड़ी जनभावना ने उसकी सबसे बड़ी कमाई के सबूत पेश कर दिए।


“मैं कह नहीं सकता, और न ही कहूँगा

कि वह मर गया है।

वह बस चला गया है।

एक प्रसन्न मुस्कान और हाथ के इशारे के साथ

वह एक अनजान भूमि में चला गया है,

और हमें यहाँ यह सपना छोड़ गया है

कि वह वहाँ कितना सुंदर होगा,

क्योंकि वह वहाँ ठहरने गया है।”

आज बलिया रो रहा है…
आज बलिया की मिट्टी नम है।
आज सड़कों पर खामोशी है।
आज हजारों आंखों में आंसू हैं।
लेकिन इसी दर्द के बीच एक सच भी सामने खड़ा है—
जिस जनसेवक को विदा करने के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आएं, उसकी सबसे बड़ी कमाई किसी तिजोरी में नहीं होती।
वह कमाई होती है—
लोगों के दिलों में।
और दिलों की यह दौलत न कोई छीन सकता है, न कोई गिन सकता है।
समय आगे बढ़ेगा।
सियासत बदलेगी।
नई पीढ़ी आएगी।
नए नेता बनेंगे।
लेकिन आज बलिया ने जिस तरह अपने एक जनयोद्धा को विदा किया है, वह दृश्य लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेगा।
किरदार समाप्त हुआ है…
कहानी नहीं।
एक योद्धा चला गया है…
उसकी यादें अभी बाकी हैं।
**अलविदा… जनयोद्धा।