बलिया। जिले के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के निर्धारित मानकों की अनदेखी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जिला अस्पताल सहित अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) मूलभूत सुरक्षा एवं संचालन संबंधी मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं।

सबसे गंभीर मामला अग्निशमन सुरक्षा का है। जिला अस्पताल के भवन को अब तक फायर विभाग का नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) नहीं मिला है। ऐसे में किसी भी आपात स्थिति में मरीजों, तीमारदारों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा को लेकर बड़ा खतरा बना हुआ है।

यही नहीं, कई सरकारी अस्पतालों में प्रदूषण नियंत्रण और बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन से जुड़े मानकों के पालन पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्वास्थ्य संस्थानों में आवश्यक व्यवस्थाओं के अभाव से संक्रमण और पर्यावरणीय जोखिम बढ़ने की आशंका बनी रहती है।

जिले के अधिकांश सीएचसी और पीएचसी में डॉक्टरों तथा नर्सिंग स्टाफ के स्वीकृत पद खाली पड़े हैं। कई अस्पतालों का संचालन फार्मासिस्ट, वार्ड बॉय और सीमित कर्मचारियों के भरोसे हो रहा है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के कारण मरीजों को समय पर समुचित उपचार नहीं मिल पा रहा, जबकि गंभीर मामलों में उन्हें जिला अस्पताल या अन्य बड़े चिकित्सा केंद्रों के लिए रेफर कर दिया जाता है।

FIRE NOC


स्वास्थ्य विभाग के भीतर भी इस स्थिति को लेकर असंतोष बताया जा रहा है। सीमित संसाधनों और मानवबल की कमी के कारण अस्पतालों की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है, वहीं मरीजों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का दावा सवालों के घेरे में है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी अस्पताल स्वयं अग्निशमन, प्रदूषण नियंत्रण और मानव संसाधन जैसे अनिवार्य मानकों का पालन नहीं कर पा रहे हैं, तो मरीजों की सुरक्षा और बेहतर इलाज की जिम्मेदारी आखिर कौन सुनिश्चित करेगा? यह विषय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर समीक्षा का विषय बन चुका है।